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Gratitude Quran Quotes in Hindi-कृतज्ञता के बारे में कुरान की आयतें

الحمد لله رب العالمين

कृतज्ञता एक ऐसा गुण हैं, जिसके बारे में हर धर्म स्वीकृति देता हैं। इस गुण को सारे गुणों का सरदर माना जाता हैं। आज हम इस्लाम धर्म की पवित्र धर्म ग्रंथ कुरान में कृतज्ञता के बारे में क्या बताया गया हा यह जानेंगे।

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कुरान शरीफ में ६६६६ आयात मतलब verses हैं, जिसकी पहली आयात सुरु ही होती हैं कृतज्ञता प्रकट करने से, जी मैंने ऊपर लिखा हैं। वोही से सुरूवाद होती हैं कुरान शरीफ की। जिसमे आभार, प्रसंगशा, कृतज्ञ ज्ञापन किया गया है, उस रब का जो पूरे आलम का रब हैं। जितनी भी सृष्टि हैं पूरे सृष्टि का जो मालिक हैं। उनकी तारीफ उनकी प्रति धन्यवाद का भाव प्रकट किया गया हैं कुरान शरीफ की पहली आयात में।

इससे क्या समझ में आता हैं, के किसी भी चीज की सुरुवाद करने से पहले अपने रब का शुक्र करो, अपने ईश्वर का कृतज्ञ ज्ञापन करो,फिर कोय काम की पहल करो। तो कुरान की पहली आयात से हमे यह सिख मिलती है सबसे से पहले अपने रब का शुक्रिया अदा करना चाहिए, किसी भी काम की सुरुवाद से पहले।

कुरान क्या हैं

कुरान अल्लाह की नाजिल करदा आसमानी किताब हैं। जो किसी इंसान ने नहीं बल्कि खुद सृष्टि के पालनकर्ता पालनहार रब ने अपने प्यारे प्यागंबर प्यारे नबी हजरत मुहम्मद (ﷺ) के ओहि के माध्यम से नाजिल किए हैं। इस धर्मग्रंह में लिखी गए हैं हर आयात हर एक एक हुरूफ खुदा के हैं। आप कुरान को जब पड़ेंगे तो गोया आपको किताब नहीं बल्के खुदा से बातें करता हूवा खुदको पाएंगे। ये ऐसे एक मोजेजा हैं जिसको कोई फेर बदल नही कर सकता। जिसमे सदियों बीत जाने के बाद भी एक अक्सर भी फेर बदल नही हुए हैं। इस किताब की सलामती की जिम्मा खुद बारीताला खुदा ए पाक ने अपने जिम्मे ले रख खा हैं। कुरान को कभी जलाया या डुबायता या मिटाया नहीं जा सकता। कुएकी कुरान दुनिया में अनगिनत हाफिज,अलीम और सूफिया के दिलो में महफूज हैं।

कुरान मैं कृतज्ञता का ज़िक्र

अल्लाह ने कुरान में कृतज्ञता का जिक्र किए है। वह हमें कृतज्ञ होने की लिए कुरान में 50 जगाओ पर कृतज्ञता का ज़िक्र हैं। इस से कृतज्ञता का महत्व इस्लाम में कितना अधिक हैं, पता लगाया जा सकता है। जिस गुण के बारे में खुद रब ने इरशाद फ़रमाया हैं। वो गुण कितना महान और अजीम होगा यह हम सब समझ सकते हैं। Gratitude (ग्रेटिट्यूड) मतलब आभार जिसको हम हिंदी में कहते हैं, कुरान में उसे Shukr (शुक्र,शुकराना,शुक्रिया) के नाम से दर्शाया गया हैं। और shakereen (शेकरीन) उनलोगो को कहा गया हैं जो हर हाल में, हर परिस्थिति में अपने रब का शुक्र बजा लाते है, वो लोग हैं। जो लोगो का दिल हमेशा अपने रब से राज़ी रहता है, जो उसके जीवन के हर मुकाम पर खुश रहते हैं, उन्हे शेकरिन कहा जाता हैं।

कृतज्ञता पर कुरान की संदेश (Shukar ayat in Quran)

وَٱشۡكُرُواْ لِلَّهِ إِن ڪُنتُمۡ إِيَّاهُ تَعۡبُدُونَ… और अल्लाह के शुक्रगुज़ार बनो, अगर तुम उसी की इबादत करते हो।” (2:172)
"अगर आप आभारी हैं और ईमान लाए तो अल्लाह आपकी सजा का क्या करेगा?  और हमेशा अल्लाह सराहना करने वाला और जानने वाला है ”।  (4:147)
"अल्लाह आपके लिए आराम चाहता है और आपके लिए कठिनाई का इरादा नहीं रखता है और [चाहता है] कि आप अवधि को पूरा करें और अल्लाह की महिमा करें, जिसके लिए उसने आपको निर्देशित किया है;  और शायद आप आभारी होंगे"।  (2:182-188)
"और अल्लाह ने तुम्हें बिना कुछ जाने तुम्हारी मां के पेट से निकाल दिया, और उसने तुम्हारे लिए श्रवण और दृष्टि और बुद्धि बनाई कि शायद तुम आभारी हो।  (16:78)
"और वही है जिसने समुद्र को तुम्हारे वश में कर दिया है, कि उसका कोमल मांस खाओ, और जो गहने तुम पहनते हो, उस में से निकालो।  और तुम जहाजों को उसमें हल चलाते हुए देखते हो, और [उसने उसे वश में कर लिया] कि तुम उसके अनुग्रह की खोज करो;  और शायद आप आभारी होंगे।  (16:14)
"तब मैं उनके पास उनके आगे से और उनके पीछे से, और उनके दाहिनी ओर और उनके बायीं ओर से आऊंगा, और तुम उन में से अधिकांश को [तुम्हारा] कृतज्ञ न पाओगे।”  (7:17)

इस पंक्ति में शैतान मतलब devil खुदा से यह दावा करता है, कि में आपके बंदों को हर तरफ से गुमराह करूंगा और उन्हे आप कृतज्ञ नही पाओगे ।

"यदि आप (अल्लाह) को अस्वीकार करते हैं, तो वास्तव में अल्लाह को आपकी कोई आवश्यकता नहीं है;  परन्तु वह अपने बंदों की ओर से कृतघ्नता को पसन्द नहीं करता;  यदि तुम कृतज्ञ हो, तो वह तुम पर प्रसन्न होता है।”  (39:7) 
"तो मुझे याद करो; मैं तुम्हें याद करूंगा। मेरे लिए आभारी रहो, और मुझे अस्वीकार मत करो" ( 2:152)। 
"हमने उसे (यानी आदमी को) रास्ता दिखाया: चाहे वह आभारी हो या कृतघ्न (उसकी इच्छा पर टिकी हुई है) ” (76: 3) 
"यदि आप आभारी हैं, तो वह आपसे प्रसन्न है..." (39:7)
 "वह वही है जिसने तुम्हें तुम्हारी माताओं के गर्भ से निकाला, जबकि तुम कुछ भी नहीं जानते थे; और उसने तुम्हें श्रवण और दृष्टि और बुद्धि और स्नेह दिया: कि तुम (अल्लाह को) धन्यवाद दो"  (16:78)  
"यदि तूम कृतज्ञ है, तो मैं निश्चय तुम्हेें और अधिक दूंगा" (14:7)। 
"यह मेरे प्रभु की कृपा से है!  - मुझे परखने के लिए कि मैं आभारी हूँ या कृतघ्न!  और यदि कोई कृतज्ञ है, तो वास्तव में उसकी कृतज्ञता उसकी अपनी आत्मा के लिए है;  लेकिन अगर कोई कृतघ्न है, तो वास्तव में मेरे भगवान सभी जरूरतों से मुक्त हैं, सम्मान में सर्वोच्च हैं!" (27:40) 
"यदि आप आभारी हैं, तो मैं निश्चित रूप से आपको और अधिक दूंगा;  और यदि तू कृतघ्न है, तो मेरी ताड़ना सचमुच कठोर है।”  (14:7) 
"यदि कोई इस जीवन में प्रतिफल चाहता है, तो हम उसे देंगे;  और यदि कोई आख़िरत में बदला चाहता है, तो हम उसे देंगे।  और हम उन लोगों को शीघ्रता से पुरस्कृत करेंगे जो (हमारे साथ) कृतज्ञता की भाव रखते हैं।"  (3:145) 
"और आपके पास जो भी आशीर्वाद और अच्छी चीजें हैं, वह अल्लाह की ओर से है।"  (16:53)

अल्लाह ने अपने बंदों के साथ कृतज्ञता का जिक्र किया है। वह हमें कृतज्ञ होने की याद दिलाता रहता है। क्यों? क्योंकि मनुष्य कृतघ्न होते हैं! मनुष्य जितना भी प्राप्त करले मगर फिर भी वो संतुष्ट नहीं हो पता है, वो हमेशा और के पीछे भागता रहता हा। यही कारण हैं के हमें इसके बारे में कुरान में कई बार समझाया गया है। वास्तव में कुरान की शुरुआत अल्हम्दुलिल्लाह से होती है। कुरान का पहला अध्याय “अल्लाह की शुक्र करो” से शुरू होता है।

कुरान के अनुसार कृतज्ञता के ३ स्तर

कुरान के अनुसार, हमारे सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्यों में से एक अपने रब के सभी आशीर्वादों के लिए आभारी होना है। हम कृतज्ञता के तीन स्तरों का वर्णन कर सकते हैं:

  • पहला दिल से और भीतर सभी आशीर्वादों को महसूस करना
  • दूसरा अपने रब की सराहना करना, जुबान से धन्यवाद कहना।
  • तीसरा नेक कर्म करके कृतज्ञता व्यक्त करना।

आसान शब्दों में, यही मतलब है की कृतज्ञता का पहला हैं दिल से उन सारी चीजें के लिए आभार का भाव जागरूक करना जो अभी मौजूद है है हमारे पास। दूसरा के जब यह कर चुके तो उसे जुबान से जाहिर करना के हम कोन कोन से चीजों को लिए शुक्र करते हैं और तीसरा स्तर है जब हम अपने कर्मों से साबित करते हैं कि हम वास्तव में अपने रब का आभारी हैं।

Conclusion

पवित्र कुरान की आयतों से हमें पता चला कि इस्लामी चरित्र के लिए कृतज्ञता आवश्यक है और इस्लाम में कृतज्ञता का अभ्यास करना अधिक समृद्धि का साधन है। हमें हर उस चीज के लिए आभारी होना चाहिए जिसमें हमारे पास स्वास्थ्य, धन, सांस, परिवार, दोस्त और अन्य सभी चीजें हैं चाहे वह बहुत छोटी हो या बड़ी हमेशा आभारी रहना चाहिए।

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